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सी.एम.एस. छात्रा अक्षिता को गोल्ड मेडल

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                                                                                               -कुलभूषण शर्मा

                                                                                                अध्यक्ष, नेशनल इंडिपेन्टेन्ड स्कूल्स एलायन्स (नीसा), भारत

 

                                 शिक्षा बचाओं अभियान!

वैश्विक कोरोना महामारी के कारण देश के छोटे-छोटे निजी स्कूलांे का अस्तित्व ही खत्म होता जा रहा है। ये निजी स्कूल, जो देश के 50 प्रतिशत से अधिक बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान कर रहे थे और जो कई दशकों से शिक्षा के क्षेत्र में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते आ रहे थे, आज अपना अस्तित्व बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। और सबसे ज्यादा दुःख देने वाली बात यह है कि जिस सरकार की मदद देश के छोटे-छोटे ये निजी स्कूल पिछले कई दशकों से करते आ रहे थे, आज वही सरकार उनके साथ खड़ी नहीं है। जिसके कारण देश के लाखों निजी स्कूल बंद होने के कगार पर आ गये हैं और इन स्कूलों में सेवा देने वाल करोड़ों शिक्षकों एवं गैर शैक्षणिक कर्मचारियों के परिवार भुखमरी की दहलीज तक पहुंच गये हैं। स्कूल बसें कैम्पस में खड़ी हो चुकी है और ड्राईवर और हेल्पर बेरोजगार हो चुके हैं।

देश के बच्चों को शिक्षा देने का काम सरकार का है। यह उनका संवैधानिक दायित्व है कि वे देश के प्रत्येक बच्चे को निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा प्रदान करवाये। निजी स्कूलों ने यदि सरकार का सहयोग न किया होता तो सरकार अकेले देश के सारे बच्चों को शिक्षा प्रदान नहीं करवा सकती थी। वास्तव में निजी स्कूलों का उदय ही उस समय हुआ जब सरकार अकेले जनता की शिक्षा की जरूरतों को पूरा नहीं कर पा रही थी। आज निजी स्कूल लोगों की पहली पंसद ही नहीं बल्कि एक अहम जरूरत बन चुके हैं। लेकिन यह अत्यन्त दुख की बात है कि आज देश के इन्ही निजी स्कूलों एवं उनके शिक्षकों व कर्मचारियों को सरकार द्वारा महत्व नहीं दिया जा रहा है। इनमें से 70 प्रतिशत ऐसे बजट प्राइवेट स्कूल हैं, जिनकी फीस 1 हजार रूपये से भी कम है। संकट के इस काल में अभिभावक चाहकर भी आर्थिक तंगी के कारण इन निजी स्कूलों में पढ़ने वाले अपने बच्चों की फीस जमा नहीं कर पा रहे हैं। एक आंकलन के अनुसार पिछले शैक्षिक सत्र 2019-2020 में इन निजी स्कूलों में 25 से 50 प्रतिशत तक फीस जमा ही नहीं हुई और वर्तमान शैक्षणिक सत्र में भी अभी तक 80 प्रतिशत स्कूलों को अत्यधिक 2 प्रतिशत फीस ही मिली है।

कोरोना महामारी के कारण उत्पन्न परिस्थितियों में देश के मध्यम एवं निम्न वर्ग के नागरिकों की आर्थिक स्थिति पूरी तरह से चरमरा गई है। इनमें से अधिकांश निजी स्कूल के अभिभावक है, जो कम फीस देकर अपने बच्चों को इन स्कूलों में पढ़ा रहे थे। अभी तक ये अभिभावक एक ओर जहां निजी स्कूलों में अपने बच्चों की फीस जमा कर रहे थे तो वहीं दूसरी ओर इनमें से बहुत सारे अभिभावक आयकर एवं शिक्षा कर का भुगतान करके सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की पढ़ाई में सरकार की मदद भी करते आ रहे थे। आज ये असहाय अभिभावक निजी स्कूलों में पढ़ने वाले अपने बच्चों की फीस नहीं दे पा रहे हैं। ऐसे में ये बड़ी उम्मीद के साथ सरकार की ओर देख रहे हैं, लेकिन अभी तक सरकार ने इनके बच्चों की फीस के लिए कुछ भी नहीं किया है। वास्तव में सरकार का दायित्व था कि वे मुसीबत के इस वक्त में इन निम्न एवं मध्यम वर्ग के अभिभावकों की मदद करती क्योंकि इनमंे से कुछ अभिभावकों की नौकरियां चली गई तो कुछ के काम-धंधे बंद हो गये। ऐसे में ये अभिभावक मजबूरी में निजी स्कूलों में पढ़ने वाले अपने बच्चों की फीस नहीं भर पा रहे हैं। जिसके कारण देश के अधिकांश निजी स्कूल अपने शिक्षकों एवं गैर शैक्षणिक कर्मचारियों को कई महीनों से वेतन नहीं दे पा रहे हैं। इसके विपरीत आज सरकारी स्कूल के शिक्षक इस परेशानी से दूर है क्योंकि इन शिक्षकों के सरकारी वेतन पर कोरोना महामारी का कोई असर नही हुआ है। यह और बात है कि इन स्कूलों में आॅनलाइन पढ़ाई तो शायद नाममात्र ही होती हो।

कई समाचार पत्रों एवं मीडिया में यह खबर भी देखने को मिली कि निजी स्कूलांे के कई शिक्षकों ने आर्थिक तंगी के कारण आत्महत्या तक कर ली है। कोई शिक्षक सब्जी का ठेला लगाने लग गया है तो कईयों ने मनरेगा में काम करना शुरू कर दिया है। कई शिक्षकों को तो स्कूलों ने मजबूरी में ही सही नौकरी से निकाल दिया है। लेकिन आज शिक्षकों की इस दुर्दशा पर न कोई बोलता दिख रहा है और न समझता दिख रहा है।

इतिहास गवाह है शिक्षक ने कभी भी किसी के सामने हाथ नहीं फैलाया। क्या इतने दशकों में किसी शिक्षक ने मदद की कभी गुहार लगाई? लेकिन आज निजी स्कूलों के लाखों शिक्षक बेरोजगार और खामोश बैठे हैं। वे अपनी मन की व्यथा किसी को बता नहीं पा रहे हैं। क्योंकि शिक्षक की एक गरिमा होती है। शिक्षक स्वाभिमानी होता है। वह हर बात पर बोल नहीं पाता और वो बोलना बेहतर भी नहीं समझता। क्या शिक्षक की इस बेबसी को, शिक्षक की इस मजबूरी को हमारा देश समझ नहीं पा रहा है? नहीं सुन पा रहा है? अगर वह खामोश है तो तब भी क्या उनकी खामोशी कुछ बोल नहीं रही है? जिसको देश के माननीय प्रधानमंत्री जी, वित्त मंत्री जी, शिक्षा मंत्री जी, देश के सभी राज्यों के माननीय मुख्यमंत्री जी एवं शिक्षा व परिवहन मंत्री जी सुन नहीं पा रहे हैं? क्या देश के लिए शिक्षा नीति बनाने व उनको लागू करने वाले प्रशासनिक अधिकारियों के कानों तक शिक्षकों की बात नहीं पहुंच रही है? अपने-अपने मन की बात तो सभी कर रहे हैं किन्तु दुःख की बात यह है कि राष्ट्र के निर्माता कहे जाने वाले इन शिक्षकों की मन की व्यथा को न तो कोई समझना चाह रहा है और न ही कहना चाह रहा है।

देश के लिए नीति बनाने वाले राजनेताओं से लेकर ब्यूरोक्रेटस, जिनके पास इन शिक्षकों को राहत देने की शक्ति है, खामोश बैठे हैं। आज अगर ये इस स्थिति में हैं कि वे देश के नीति निर्माण में अपना योगदान दे रहे हैं तो उनके पीछे भी तो किसी न किसी शिक्षक का ही तो हाथ है? किसी न किसी शिक्षक ने तो इनको पढ़ाया ही होगा? इन सभी के दिलों में किसी न किसी शिक्षक की छवि जरूर होगी। और आज वो शिक्षक इनकी तरफ बहुत उम्मीद भरी निगाहों से देख रहा है।

आज कुछ लोग शिक्षकों के प्रति आपत्तिजनक बात कर रहे हैं। शिक्षा के मंदिरों के लिए आपत्तिजनक बातें कर रहे हैं। हमारा दिल वेदनाओं से भरा हुआ है। बहुत द्रवित है कि देश के जिम्मेदार पदों पर बैठे हुए राजनेता और अधिकारी अपने-अपने मन की बात कर रहे हैं, लेकिन जिनकी वजह से आज ये इन पदों पर आसीन हैं, क्या जिन शिक्षकों ने इनको इस योग्य बनाया, उन शिक्षकों की व्यथा पर किसी ने ध्यान दिया? क्या किसी ने उनकी व्यथा की चिंता की? किसी ने नहीं की। ऐसे में हम शिक्षक कैसे खुश रहें? हमारे मन में एक वेदना है। हमारे मन में दुःख है। उस दुःख को हम व्यक्त करना चाहते हैं।

हमने अपनी प्रार्थना को प्रधानमंत्री जी तक पहुंचाने के लिए ट्वीट किया, पत्र भेजे, सोशल मीडिया का सहारा लिया। हमने अपनी बात पत्र लिख-लिखकर केन्द्रीय शिक्षा मंत्री, सभी राज्यों के मुख्यमंत्री, शिक्षा मंत्री, परिवहन मंत्री और जिम्मेदार अधिकारियों तक पहुंचाई, लेकिन किसी का भी एक भी सकारात्मक जवाब शिक्षकांे के पक्ष में नहीं आया। कहीं से भी कोई ऐसा जवाब नहीं आया कि जो शिक्षा के मंदिर है, ये जो राष्ट्र निर्माता कहे जाने वाले शिक्षक हैं, उनको व उनके परिवार को बचाने के लिए कोई कदम उठाया जाये। अरे भाई शिक्षकों का भी परिवार है, जो आज भुखमरी के कगार पर आ गये हैं। पहले इनकी जरूरतें वेतन से पूरी हो जाती थी अब नहीं हो पा रही है। तो क्या ऐसे में उनकी स्थिति पर चिंतन-मनन करना जरूरी नहीं है? इसलिए अब जरूरत आ पड़ी है कि हम अपनी आवाज को और भी ज्यादा बुलंद करें ताकि हमारी यह आवाज देश के प्रधानमंत्री के कानों तक अवश्य पहुंचे। 

आज शिक्षा का जो ढांचा है, वो ध्वस्त हो चुका है और जो आने वाली परिस्थितियां है वो और भी ज्यादा भयानक हैं। बैंक अभी तक ऋण की किश्त नहीं मांग रहा था, जो अब देनी पड़ेगी। स्कूल के पास पैसा न रह गया है और न आ रहा है। शिक्षक को भी वेतन नहीं बट पा रहा है। ऐसे मंे अब जरूरत है अपनी बात देश के माननीय प्रधानमंत्री जी तक पहुंचाने की। आज देश के 2 करोड़ लोग शिक्षा के साथ सीधे जुड़े हुए हैं। इस संख्या में केवल स्कूल संचालक एवं शिक्षक ही शामिल हैं। इसके अलावा भी बहुत लोग हैं, जो स्कूल के साथ जुड़े हुए हैं इनमें वे लोग भी है, जो स्कूल के साथ अपना व्यवसाय करते हैं। उनका व्यवसाय भी पूरी तरह से ठप हो चुका है।

आज सभी खामोश बैठे हैं। लेकिन हम लोगों से खामोश नहीं बैठा जा रहा है और हम खामोश रहेंगे भी नहीं। नीसा की शुरू से ही यह मांग रही है कि शिक्षा नीति ‘‘च्वा़इस-संेटर््ड’’ होनी चाहिए और सरकार को सीधे बच्चों को फंड करना चाहिए। आज जब अभिभावक आर्थिक रूप से सक्षम ही नहीं है तो वह हमें फीस का भुगतान कैसे करेगें? तो ऐसे में सरकार को निजी स्कूलों की मदद करने के लिए आगे आना चाहिए। इसके लिए सरकार को सीधे बच्चों को फंड करना चाहिए और हमें विश्वास है कि जिस दिन से सरकार ने सरकारी स्कूलों को देेने की बजाए देश के सभी बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त करने के लिए सीधे अभिभावक को फंड देना शुरू कर दिया, उस दिन से न केवल शिक्षकों एवं शिक्षा के मंदिरों की दशा एवं दिशा बदलेगी बल्कि देश के विकास को भी एक नई गति अवश्य मिलेगी।

इसलिए, मैं आप सबसे यह निवेदन करता हूँ कि आप भी खामोश न रहें। जो खामोश रहता है, उसकी बात कोई नहीं सुनता है। जब तक आप अपनी बात को बोलेंगे नहीं, आपकी बात देश के माननीय प्रधानमंत्री जी, वित्त मंत्री जी, केन्द्रीय शिक्षा मंत्री जी, विभिन्न राज्यों के माननीय मुख्यमंत्री और शिक्षा मंत्री व परिवहन मंत्री के साथ ही प्रशासनिक अधिकारियों के कानों तक नहीं पहुंचेंगी। इसलिए हमें अपनी आवाज़ को और अधिक बुलंद करने की जरूरत है और जिसके लिए नीसा आप सभी से यह आवाह््न करता है कि आप ‘शिक्षा बचाओं अभियान’ में अपनी महत्वपूर्ण भागीदारी देकर इस अभियान को सफल बनायंे।

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