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जमीन विवादों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, क्या बनेगी राजस्व न्याय सेवा’? सरकार से मांगा जवाब

देश में जमीन से जुड़े विवादों के समाधान को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अहम पहल की है। कोर्ट ने केंद्र सरकार और राज्यों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। यह सुनवाई उस याचिका पर हो रही है, जिसमें जमीन से जुड़े मामलों के तेज और न्यायपूर्ण निपटारे के लिए ‘राजस्व न्याय सेवा’ के गठन की मांग की गई है।

जमीन विवादों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, क्या बनेगी राजस्व न्याय सेवा’? सरकार से मांगा जवाब

देश में जमीन से जुड़े विवादों के समाधान को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अहम पहल की है। कोर्ट ने केंद्र सरकार और राज्यों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। यह सुनवाई उस याचिका पर हो रही है, जिसमें जमीन से जुड़े मामलों के तेज और न्यायपूर्ण निपटारे के लिए ‘राजस्व न्याय सेवा’ के गठन की मांग की गई है। साथ ही इन मामलों की सुनवाई करने वाले अधिकारियों के लिए न्यूनतम कानूनी योग्यता और प्रशिक्षण तय करने की बात भी उठाई गई है।

“66% सिविल विवाद जमीन से जुड़े”—याचिका में दावा

वकील अश्विनी उपाध्याय की ओर से दायर जनहित याचिका में बताया गया है कि देश में करीब 66 प्रतिशत सिविल विवाद जमीन से संबंधित होते हैं। याचिका में कहा गया है कि इन मामलों पर ऐसे अधिकारी फैसले दे रहे हैं, जिनके पास न तो औपचारिक कानूनी शिक्षा है और न ही पर्याप्त प्रशिक्षण। इसी कारण कई बार गलत फैसले सामने आते हैं, जिससे न्याय प्रक्रिया प्रभावित होती है।

संपत्ति अधिकारों में देरी से बढ़ती है परेशानी

याचिकाकर्ता के अनुसार मौजूदा व्यवस्था में संपत्ति के अधिकार को लेकर लंबे समय तक अनिश्चितता बनी रहती है। इसके चलते जमीन का उपयोग और ट्रांसफर रुक जाता है, जबकि मुकदमों का खर्च लगातार बढ़ता रहता है। इससे आम लोगों को समय पर न्याय नहीं मिल पाता और वे आर्थिक व मानसिक दबाव झेलते हैं।

मौलिक अधिकारों के उल्लंघन का आरोप

याचिका में यह भी कहा गया है कि वर्तमान व्यवस्था संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार) का उल्लंघन करती है। इसलिए एक सुदृढ़ और प्रशिक्षित न्यायिक ढांचे की आवश्यकता है, जो जमीन से जुड़े विवादों का समयबद्ध समाधान कर सके।

कोर्ट ने बताया “दिलचस्प मामला”

इस मामले की सुनवाई करते हुए चीफ जस्टिस सूर्य कांत और जस्टिस जोयमाल्या बागची की पीठ ने याचिका को “दिलचस्प” करार दिया। अदालत ने संकेत दिया कि इस विषय पर पहले भी कुछ फैसले आ चुके हैं और वह सरकार का पक्ष जानना चाहती है। अब सभी की नजर सरकार के जवाब पर टिकी है, जिससे आगे की दिशा तय होगी।

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