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एकान्तवास तथा विवेक

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कोई एकदम से राजा जनक नहीं बन जाता। जनक राजा ने निर्जन में बहुत तपस्या की थी। संसार में रहते हुए भी बीच-बीच में एकान्तवास करना चाहिए। गृहस्थी से बाहर निकलकर एकान्त में अकेले रहकर भगवान के लिए तीन दिन ही रोया जाए तो वह भी अच्छा है। यहां तक कि यदि अवसर पाकर एक ही दिन निर्जन में रहकर भगवतचिंतन किया जाए, तो वह भी अच्छा है। लोक स्त्री-पुत्रों के लिए घड़ा भर आंसू बहाते हैं, ईश्वर के लिए भला कौन रोता है? बीच-बीच में निर्जन में रहकर भगवत्प्राप्ति के लिए साधना करनी चाहिए। संसार के भीतर, विशेषकर, कामकाजकी झंझट में रहकर प्रथम अवस्था में मन को स्थित करते समय अनेक बाधाएं आती हैं। जैसे रास्ते के किनारे लगाया हुआ पेड़, जिस समय वह पौधे की स्थिति में रहता है, उस समय घेरा न लगाने पर गाय-बकरियां खा जाती हैं। प्रथम अवस्था में घेरे की आवश्यकता होती  है, किन्तु बाद में तना मजबूत होने पर घेरे की आवश्यकता नहीं रहती। फिर उसे हाथी बांधने पर भी कुछ नहीं होता।
रोग तो हुआ सन्निपात का, पर जिस कमरे में सन्निपात का रोगी है, उसी कमरे में पानी का घड़ा और इमली या अचार रखा है। यदि रोगी को आराम पहुंचाना चाहते हो तो पहले उसे उस कमरे से हटाना होगा। संसारी जीव मानो सन्निपात का रोगी है; और विषय है पानी का घड़ा। विषयभोग-तृष्णा मानो जल-तृष्णा है। इमली, अचार की बात केवल सोचते ही मुंह में पानी आ जाता है, वे वस्तुएं पास नहीं लानी पड़तीं। ऐसी वस्तुएं रोगी के कमरे में ही रखी हैं। संसार में स्त्री-सहवास ऐसी ही वस्तु है। इसीलिए निर्जन में जाकर चिकित्सा कराना आवश्यक है। 
विवेक वैराग्य प्राप्त करके संसार में प्रवेश करना चाहिए। संसार समुद्र में काम-क्रोधाग्नि मगर हैं। शरीर में हल्दी मलकर पानी में उतरने का मगर का डर नहीं रहता। विवेक-वैराग्य ही हल्दी है। सत्-असत् विचार का नाम विवेक है। ईश्वर की सत् हैं, नित्यवस्तु है, बाकी सब असत्, अनित्य, दो दिन के लिए है- यह बोध ही विवेक है, और ईश्वर के प्रति अनुराग चाहिए, प्रेम, आकर्षण चाहिए- जैसा गोपियों का कृष्ण के प्रति।... राधाकृष्ण को मानो या न मानो, पर उनके इस आकर्षण को तो ग्रहण करो। ईश्वर के लिए इस प्रकार की व्याकुलता हो, इसके लिए प्रयत्न करो। व्याकुलता के आते ही उन्हें प्राप्त किया जा सकता है।

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