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फिल्म समीक्षा

जिसके एक हाथ में माला है और दूसरे हाथ में भाला है : सरकार 3

जिसके एक हाथ में माला है और दूसरे हाथ में भाला है : सरकार 3

जिसके एक हाथ में माला है और दूसरे हाथ में भाला है : सरकार 3

फ़िल्म: सरकार 3
निर्देशक: राम गोपाल वर्मा
कलाकार: अमिताभ बच्चन मनोज बाजपाई रोनित रॉय अमित साध जैकी श्रॉफ यामी गौतम
रेटिंग: 2 स्टार

सरकार यानी सुभाष नागरे गरीबों का हमदर्द मुंबई का रखवाला जिसके सामने प्रशासन की भी नहीं चलती. जिसके एक हाथ में माला है और दूसरे हाथ में भाला है सरकार वही करता है जो वह सही मानता है | अपने दोनों बेटों को खो देने के बाद उसमें और गुस्सा भर गया है आवाज़ धीमी हो गई है लेकिन बात में वज़न बढ़ गया है सरकार यानी अमिताभ बच्चन | रामगोपाल वर्मा की सरकार श्रृंखला की यह तीसरी फ़िल्म है |

कहानी: 2 स्टार

कहानी वहां से शुरू होती है जहां पिछली बार ख़त्म हुई थी सरकार का पोता शिवाजी नागरे यानी अमित साध अपने दादा के साथ मिलकर काम करना चाहता है पिता की मौत का गुस्सा भी भरा हुआ है उसमें. दादा के ख़ास आदमी गोकुल से भी खुन्नस है उसे गोकुल से शिवाजी को यह भी खतरा है कि कहीं दादा सुभाष नागरे गोकुल को अपना उत्तराधिकारी ना बना दें. सरकार के दुश्मन एकजुट हो गए हैं. सभी सरकार को मारना चाहते हैं. उनके करीबियों को तोड़ना चाहते हैं |लेकिन आखिर में वही होता है जिसके लिए आप टिकट खरीद कर यह फ़िल्म देखने जा रहे हैं बस जिस तरह से होता है उसके लिए आपको पॉपकॉर्न के पैसे खल जाएंगे |

कहानी में कुछ भी नया नहीं है बेवजह के ट्विस्ट हैं फ़िल्म ख़त्म होते-होते ऐसा लगता है कि क्लाइमेक्स के नाम पर सिर्फ़ फ़ैला हुआ पसारा समेटने की कोशिश की जा रही है कहानी के लिए इस फ़िल्म को 2 स्टार से ज़्यादा दे पाना बेईमानी होगी |

एक्टिंग: 4 स्टार

अमिताभ बच्चन सिर्फ एक्टिंग नहीं करते उनके भीतर किरदार की आत्मा घुस जाती है उंगलियों को हिलाना चश्मे के भीतर से थकी आंखों का झांकना उठना बैठना. सबकुछ बिलकुल नपा-तुला वह साबित करते हैं कि कोई भी सरकार नहीं बन सकता उसके लिए 40 साल देने पड़ते हैं अपने काम को |अमिताभ बच्चन के सामने अमित साध को एक ही फ्रेम में देखना मन खराब कर देता है ना तो उनमें बाप का बदला लेने आए बेटे की आग दिखती है ना ही यामी गौतम के साथ उनके सीनों में कोई रोमांस नज़र आता है | यामी गौतम फ़िल्म में क्यों हैं इसका हमारे पास कोई जवाब नहीं है उनमें भी अपने बाप का बदला लेने का कोई जज़्बा नहीं दिखता जब वह अपने बाप के असली कातिल को मारती हैं ऐसा लगता है वह कोई रोबोट हैं जिनको रिमोट कंट्रोल से कोई निर्देश दिया गया हो और उन्होंने पूरा कर दिया हो |

मनोज बाजपेयी सरकार के दुश्मनों में से एक हैं विपक्षी पार्टी के नेता हैं अमिताभ और मनोज के आमने-सामने के सीन में लगता है यह कभी ख़त्म ना हो. कई जगह मनोज अमिताभ से 20 मालूम पड़ते हैं मनोज के किरदार की मौत गैंग्स ऑफ़ वासेपुर वाले सरदार खान की मौत याद दिलाती है उससे बहुत अलग लेकिन फिर भी उस जैसी | जैकी श्रॉफ ना तो पूरी तरह से विलन लगे हैं ना ही मसखरे सिर्फ़ खींचे हुए सीन हैं जो पूरी फ़िल्म को और बोझिल बनाते हैं | और फिर रोनित रॉय हैं गोकुल जो सरकार के असली वारिस लगते हैं फ़िल्म काबिल का माधवराव शेलार अगर जवानी में सरकार के साथ रहा होगा तो वह गोकुल ही होगा बहुत नपी-तुली बातें बहुत नपे तुले हाव-भाव |

कुछ एक दो सीन छोड़ दिए जाएं तो एक्टिंग के मामले में यह फ़िल्म औसत है एक्टिंग को दिए तो 3 स्टार जाने चाहिए लेकिन मनोज बाजपेयी और अमिताभ बच्चन इस कश्ती को संभाल लेते हैं उनकी वजह से इस फ़िल्म की एक्टिंग को हम 4 स्टार देंगे |

सिनेमेटोग्राफी: 2 स्टार

फ़िल्म में कुछ कैमरा एंगल अजीब से हैं कभी कप के हैंडल के बीच से कभी सोफे के नीचे से शायद यह फ़िल्म को ज़्यादा ड्रामेटिक बनाने के लिए किया गया होगा लेकिन एक वक़्त के बाद यह उबाऊ लगता है ऐसा ही कुछ स्लो मोशन शॉट्स के लिए भी लगता है पूरा सीन स्लो मोशन में बहुत झेलाऊ हो जाता है. पूरी फ़िल्म अपनी सरकार फ़ील को बरकरार रखते हुए अंधेरी सी लगती है. यह रामू का सिग्नेचर स्टाइल है और यह फ़िल्म इसमें कोई अपवाद नहीं है | कमरे की दीवारों और निर्जीव सामानों पर ज़रुरत से ज़्यादा फोकस से लगता है कि शायद इस सामानों से जुड़ा कोई राज़ खुलने वाला है लेकिन फ़िल्म ख़त्म हो जाती है और हम दीवारें ही ताकते रह जाते हैं |
आप भले ही हमसे इत्तेफ़ाक ना रखें लेकिन फ़िल्म की सिनेमेटोग्राफी को हम देंगे 2 स्टार

म्यूज़िक: 4 स्टार

फ़िल्म में गाने के नाम पर अमिताभ बच्चन की गाई हुई गणेश आरती है इस आरती का म्यूज़िक ज़बरदस्त है |

फ़िल्म में बीच-बीच में सरकार का सिग्नेचर गोविंदा-गोविंदा बज उठता है लेकिन कई बार इसका बजना बेवजह सा लगता है |

कहीं-कहीं बैकग्राउंड म्यूज़िक पूरे सीन पर हावी हो जाता है लगता है अगर इस वक़्त पूरा सन्नाटा होता तो शायद इस सीन का प्रभाव और गहरा पड़ता.

म्यूज़िक दमदार है जिसको हम 4 स्टार देंगे बस इसकी अति बुरी लगती है |

कुल मिलाकर : 3 स्टार

इस तीसरी सरकार में बदला ही बदला है खून हैं ड्राइंग रूम में रखा एक कुत्ते का स्टैचू है जिसपर बार-बार फोकस किया जाता है हर किसी के खून में उबाल है और फिर इस फ़िल्म में अमिताभ बच्चन हैं राम गोपाल वर्मा की इस फ़िल्म की असली आग अमिताभ बच्चन ही हैं |

अगर आप सरकार श्रृंखला के फ़ैन हैं और जानना चाहते हैं कि तीसरी फ़िल्म में क्या होने वाला है तो फ़िल्म देख आइये लेकिन अगर आप किसी ट्विस्ट या कहानी में कोई कहानी ढूंढने जा रहे हैं तो आप बहुत निराश होंगे |

कुल मिलाकर सरकार 3 को हम 2 स्टार देंगे |


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