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घाटियों के सीने पर कलात्मक घर

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घाटियों के सीने पर कलात्मक घर

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सैलानियों के लिए हर मौसम में सदाबहार पर्यटन स्थल है डलहौजी। गर्मियों में मैदानों की तपिश से निजात पाने के लिए सैलानी यहां की वादियों में दस्तक देते हैं तो सर्दियों में बर्फ का सम्मोहन सैलानियों को डलहौजी खींच लाता है।डलहौजी में कदम रखते ही सैलानी प्राकृतिक नजारों में खो जाते हैं और यहां आकर उन्हें आत्मिक आनंद की अनुभूति होती है। यहां आने वाले सैलानियों को कभी गगनचुंबी पर्वत आकर्षित करते हैं तो कभी घाटियों के सीने पर बने कलात्मक घर। कभी झरनों का संगीत उन्हें मदमस्त कर देता है तो कभी शीतल हवा के झोंके ताजगी का अहसास कराते हैं। डलहौजी की आबोहवा सचमुच में प्रकृति के फक्कड़पन का सबूत है।

अंग्रेज भी यहां की प्राकृतिक सुंदरता को देख मुग्ध हो उठे थे। तभी तो उन्होंने डलहौजी को एक पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया। लार्ड डलहौजी को तो यह स्थान अत्यंत प्रिय था उनके इस लगाव को देखते हुए ही इस स्थान का नामकरण डलहौजी के रूप में किया गया। समुद्रतल से 2,039 मीटर की ऊंचाई पर स्थित डलहौजी की खूबसूरती में पांच पहाडियों ने चार चांद लगाए हैं। इन पहाडियों को− बलूण, पौट्रिन, बकरोटा, कठलोग व टिहरा के नाम से जाना जाता है।

डलहौजी को हिमाचल प्रदेश की चंबा घाटी का प्रवेशद्वार माना जाता है। पठानकोट−चंबा मार्ग पर बनीखेत से सात किलोमीटर सर्पाकार सड़क घने जंगलों से गुजरती हुई डलहौजी शहर पहुंचती है।समूचा रास्ता प्राकृतिक नजारों से भरपूर है। डलहौजी के डायना कुंड में पहुंच कर लगता है जैसे आसपास के पहाड़ हमारे लिए बौने पड़ गये हों। यह शहर का सबसे ऊंचाई पर स्थित स्थल है और यहां खड़े होकर डलहौजी की अनुपम छटा को कैमरे में कैद किया जा सकता है। रावी, व्यास और चिनाब नदियों को आसपास बहते देखना भी आपको अच्छा लगेगा। सतधारा डलहौजी का खूबसूरत चश्मा है जो पंजपुला जाते समय रास्ते में पड़ता है। यहां के बारे में कहा जाता है कि किसी समय यहां सात जलधाराएं बहती थीं, जिस वजह से लोगों ने इसका नाम सतधारा रख दिया था। अब यहां से छह धाराएं लुप्त हो गई हैं।

डलहौजी आए हैं तो पंजपुला अवश्य जाएं। पंजपुला यहां की खूबसूरत सैरगाह है, जहां पर चहलकदमी करते हुए सैलानी स्वयं को प्रकृति के करीब पाते हैं। यहां छोटी−छोटी पुलियाओं के नीचे से बहती जलधाराएं अनूठा दृश्य पेश करती हैं। यहीं पर शहीद−ए−आजम भगत सिंह के चाचा व महान स्वतंत्रता सेनानी सरदार अजीत सिंह की समाधि भी है।

पंजपुला की ही भांति काला टोप भी डलहौजी की प्रमुख सैरगाह है। यह शहर से मात्र आठ किलोमीटर दूर है। बांज, बुरांस, चीड़ व देवदार के सघन वृक्षों के मध्य स्थित इस स्थल में प्रकृति झूमती, गाती और खिलखिलाती हुई नजर आती है। डलहौजी के पास ही जंदरीघाट पिकनिक के शौकीनों के लिए पसंदीदा स्थल है। चंबा रियासत के राजाओं के महल भी यहां सैलानियों के लिए आकर्षण का केन्द्र हैं।

डलहौजी जाकर सैलानी खजियार जाना नहीं भूलते। यह डलहौजी से बाइस किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। खजियार को मिनी स्विट्जरलैण्ड और मिनी गुलमर्ग के नाम से भी जाना जाता है। प्रकृति यहां अपने पूरे शबाब पर दिखती है। घने वृक्षों के साथ−साथ सर्पीली, बलखाती सड़कों का सुहाना सफर सैलानियों को जैसे मायालोक में ले जाता है।

डलहौजी जाने के लिए पठानकोठ तक देश के किसी भी हिस्से से रेल द्वारा पहुंचा जा सकता है। पठानकोठ डलहौजी से 78 किलोमीटर दूर है। डलहौजी के लिए सड़क मार्ग पठानकोठ से होकर जाता है। यहां से आपको बस सेवाएं आसानी से उपलब्ध हो जाएंगी। डलहौजी का मौसम गर्मियों में सुहाना होता है और सर्दियों में यहां हिमपात का दृश्य देखते ही बनता है।

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